॥ श्री कृष्णाय नमः ॥
मीरा भजन
मीरा बाई के प्रमुख भजनों का संग्रह — नीचे किसी भी शीर्षक पर जाकर पाठ करें।
मीरा बाई रचित
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु, किरपा करि अपनायो॥
जनम जनम की पूंजी पाई, जग में सभी खोवायो।खरच न खूटे चोर न लूटे, दिन दिन बढ़त सवायो॥
सत की नाव खेवटिया सतगुरु, भवसागर तर आयो।मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरख हरख जस गायो॥
मीरा बाई रचित
मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई
मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।जा के सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई॥
छांड़ि दई कुल की कानि, कहा करिहै कोई।संतन ढिग बैठि बैठि, लोक लाज खोई॥
अंसुवन जल सींचि सींचि, प्रेम बेलि बोई।अब तो बेलि फैल गई, आनंद फल होई॥
दूध की सी धोइ धोइ, मैं तो पीवूं कोई।मीरा के प्रभु गिरधर नागर, सहज मिलो आई॥
मीरा बाई रचित
पग घुंघरू बांध मीरा नाची रे
पग घुंघरू बांध मीरा नाची रे।मैं तो मेरे नारायण की, आपहि हो गई दासी रे॥
लोग कहें मीरा भई बावरी, न्यात कहे कुलनासी रे।विष को प्याला राणा जी भेज्या, पीवत मीरा हांसी रे॥
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, सहज मिले अविनासी रे।पग घुंघरू बांध मीरा नाची रे॥
मीरा बाई रचित
बसो मोरे नैनन में नंदलाल
बसो मोरे नैनन में नंदलाल।मोहनी मूरति सांवरि सूरति, नैना बने विसाल॥
अधर सुधा रस मुरली राजत, उर वैजंती माल।छुद्र घंटिका कटि तट सोभित, नूपुर सबद रसाल॥
मीरा प्रभु संतन सुखदाई, भगत बछल गोपाल।बसो मोरे नैनन में नंदलाल॥
मीरा बाई रचित
जो तुम तोड़ो पिया, मैं नाहिं तोड़ूं
जो तुम तोड़ो पिया, मैं नाहिं तोड़ूं।तोड़ी तोरी पिया, और संग जोड़ूं॥
तू जो मोती, मैं जो धागा, जैसे सोना मिले सुहागा।तू जो चंदन, मैं जो पानी, जाकी अंग अंग बास समानी॥
तू जो मंदिर, मैं जो दीपक, तू जो स्वामी, मैं जो चेरी।मीरा कहे प्रभु गिरधर नागर, ऐसी भक्ति करूं नित तेरी॥
मीरा बाई रचित
हेरी मैं तो प्रेम दीवानी, मेरा दर्द न जाणे कोय
हेरी मैं तो प्रेम दीवानी, मेरा दर्द न जाणे कोय।घायल की गति घायल जाणे, जो कोई घायल होय॥
जौहरी की गति जौहरी जाणे, कि जिन जौहर होय।सूली ऊपर सेज हमारी, किस विधि सोवण होय॥
गगन मंडल पर सेज पिया की, किस विधि मिलणा होय।मीरा के प्रभु गिरधर नागर, दरस बिना दुख होय॥
मीरा बाई रचित
घूंघट के पट खोल रे, तोहे पिया मिलेंगे
घूंघट के पट खोल रे, तोहे पिया मिलेंगे।घट घट में वो ही बसत है, तू क्यूं फिरत अकेली॥
नैनन की किरकिरी दूर कर, पलकन की बीथ मिलावे।मुख को मुख से लगा दे पिय से, सीस पगां पर धर दे॥
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, चरणन में सिर धर दे।घूंघट के पट खोल रे, तोहे पिया मिलेंगे॥
मीरा बाई रचित
चाकर राखो जी, गिरधारी लाला
चाकर राखो जी, गिरधारी लाला।चाकर रहसूं बाग लगासूं, नित उठ दरसन पासूं॥
बिंदरावन की कुंज गलिन में, तेरी लीला गासूं।चाकर को है कोन बडाई, जो तू दे सो पासूं॥
मीरा कहे प्रभु गिरधर नागर, और न कछु मैं जासूं।चाकर राखो जी, गिरधारी लाला॥
मीरा बाई रचित
ऐसी लागी लगन, मीरा हो गई मगन
ऐसी लागी लगन मीरा हो गई मगन,वो तो गलियन गलियन फिरत दीवानी॥
स्वप्न में परणी मोहन संग, सांची कहूं या झूठी री माय।जागी देखूं तो है नहीं संगी, बिरहणी बिरह सतावे री माय॥
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, दरस बिना मोहि चैन न आवे।ऐसी लागी लगन मीरा हो गई मगन॥
मीरा बाई रचित
मन रे परसी हरि के चरण
मन रे परसी हरि के चरण।सुभग सीतल कमल कोमल, त्रिविध ज्वाला हरण॥
जिन चरणन ध्रुव अटल कीन्हों, भक्त कारण धरण।जिन चरणन ब्रह्मांड भेद्यो, जिन चरणन गजराज राख्यो, बूड़तो जल सरण॥
दास मीरा लाल गिरधर, आप ही मेरो सरण॥
मीरा बाई रचित
बिन गोविंद नहिं आवे चैन
बिन गोविंद नहिं आवे चैन, बिन गोविंद नहिं आवे चैन।एक घड़ी बिसरत नहीं, विरह सताये नैन॥
नैन अंसुवन नींद नहीं, और न व्यापे काम।मीरा व्याकुल बिरहणी, रटत राधा श्याम॥
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, बेगि मिलो सुख चैन।बिन गोविंद नहिं आवे चैन॥
मीरा बाई रचित
मैं सांवरे रंग राँची
मैं तो सांवरे रंग राँची, मेरो मन भीन्यो राम रंग साची।साँची कहूं तुम सुनो सहेली, मैं गिरधर रंग राँची॥
राणा जी म्हाने या बदनामी लागे मीठी, कोई निंदो कोई कहो जी।संतन ढिग बैठ बैठ लोक लाज खोई, मैं गिरधर के रंग राँची॥
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, और न कोई म्हारो साची।मैं तो सांवरे रंग राँची॥
मीरा बाई रचित
राणा जी, म्हाँने या बदनामी लागे मीठी
राणा जी, म्हाँने या बदनामी लागे मीठी।कोई निंदो कोई बिंदो, मैं तो चलूँगी चाल अनूठी॥
साँकड़ली सेर्यां जन मिलिया, कर्यूं कर फिरूँ अपूठी।सत संगति सा ग्यान सुणैछी, तुरजन लोगाँ ने दीठी॥
मीराँ रो प्रभु गिरधर नागर, दुरजन जलो जा।राणा जी, म्हाँने या बदनामी लागे मीठी॥
मीरा बाई रचित
बरसे बदरिया सावन की
बरसे बदरिया सावन की, सावन की मन भावन की।सावन में उमगयो मेरो मनवा, भनक सुनी हरि आवन की॥
नन्हीं बूंदन मेहा बरसे, सीतल पवन सोहावन की।मीरा के प्रभु गिरधर नागर, आनंद मंगल गावन की॥
मीरा बाई रचित
जागो बंसीवारे जागो मोरे ललन
रजनी बीती भोर भयो है, घर घर खुले किवारे।जागो बंसीवारे जागो मोरे ललन॥
गोपी दही मथत सुनियत है, कंगना के झनकारे।उठो लालजी भोर भयो है, सुर नर ठाढ़े द्वारे॥
ग्वाल बाल सब करत कुलाहल, जय जय सबद उचारे।मीरा के प्रभु गिरधर नागर, शरण आयाकूं तारे॥
मीरा बाई रचित
आली री मोहे लागे वृन्दावन नीको
आली री मोहे लागे वृन्दावन नीको।घर घर तुलसी ठाकुर सेवा, दर्शन गोविन्द जी को॥
निर्मल नीर बहे जमुना को, भोजन दूध दही को।रतन सिंघासन आप विराजे, मुकुट धरो तुलसी को॥
कुंजन कुंजन फिरत राधिका, शबद सुनत मुरली को।मीरा के प्रभु गिरधर नागर, भजन बिना नर भी को॥
मीरा बाई रचित
फागुन के दिन चार होरी खेल मना रे
फागुन के दिन चार होरी खेल मना रे।बिन करताल पखावज बाजे, अनहद की झंकार रे॥
बिन सुर राग छतीसूं गावे, रोम रोम रंगसार रे।उड़त गुलाल लाल भए बादल, बरसत रंग अपार रे॥
घट के पट सब खोल दिए हैं, लोकलाज है डार रे।मीरा के प्रभु गिरधर नागर, चरण कमल बलिहार रे॥
मीरा बाई रचित
कोई कहियो रे प्रभु आवन की
कोई कहियो रे प्रभु आवन की। आवन की मन भावन की।आप न आवै लिख नहीं भेजे, वाण पड़ी ललचावन की॥
ये दोऊ नैन कह्यो नहिं मानै, नदिया बहै जैसे सावन की।कहा करूं कछु नहीं बस मेरो, पांख नहीं उड़ जावन की॥
मीरा कहे प्रभु कब रे मिलोगे, चेरी भई हूं तेरे दांवन की।कोई कहियो रे प्रभु आवन की॥
मीरा बाई रचित
राम नाम रस पीजै
राम नाम रस पीजै। मनवा! राम नाम रस पीजै।तजि कुसंग सतसंग बैठि नित, हरि चर्चा सुणि लीजै॥
काम क्रोध मद मोह लोभ कूं, चित से बाहय दीजै।मीरा के प्रभु गिरधर नागर, ता के रंग में भीजै॥
मीरा बाई रचित
राणाजी, म्हे तो गोविन्द का गुण गास्यां
राणाजी, म्हे तो गोविन्द का गुण गास्यां।चरणामृत को नेम हमारे, नित उठ दरसण जास्यां॥
हरि मंदर में निरत करास्यां, घूंघरियां धमकास्यां।राम नाम का झाझ चलास्यां, भवसागर तर जास्यां॥
यह संसार बाड़ का कांटा, ज्यां संगत नहीं जास्यां।मीरा कहै प्रभु गिरधर नागर, निरख परख गुण गास्यां॥
मीरा बाई रचित
माई री! मैं तो लियो गोविंदो मोल
माई री! मैं तो लियो गोविंदो मोल।कोई कहै छानै, कोई कहै छुपकै, लियो री बजंता ढोल॥
कोई कहै मुहंघो, कोई कहै सुहंगो, लियो री तराजू तोल।कोई कहै कारो, कोई कहै गोरो, लियो री अमोलिक मोल॥
या ही कूं सब जाणत है, लियो री आँखी खोल।मीरा कूं प्रभु दरसण दीज्यो, पूरब जनम को कोल॥
मीरा बाई रचित
सांवरा म्हारी प्रीत निभाज्यो जी
सांवरा म्हारी प्रीत निभाज्यो जी।थे छो म्हारा गुण रा सागर, औगण म्हारूं मति जाज्यो जी॥
मैं तो दासी जनम जनम की, म्हारे आंगणा रमता आज्यो जी।मीरा के प्रभु गिरधर नागर, बेड़ो पार लगाज्यो जी॥
मीरा बाई रचित
मेरो मन राम हि राम रटै
मेरो मन राम हि राम रटै।राम नाम जप लीजै प्राणी, कोटिक पाप कटै॥
जनम जनम के खत जु पुराने, नामहि लेत फटै।कनक कटोरै इमरत भरियो, नामहि लेत नटै॥
मीरा के प्रभु हरि अविनासी, तन मन ताहि पटै।मेरो मन राम हि राम रटै॥
मीरा बाई रचित
मैं गिरधर के घर जाऊं
मैं गिरधर के घर जाऊं।गिरधर म्हारो साचो प्रीतम, देखत रूप लुभाऊं॥
रैन पड़े तब ही उठ जाऊं, भोर भए उठ आऊं।रैन दिनां वाके संग खेलूं, ज्यों त्यों ताहिं रिझाऊं॥
जो पहरावे सोई पहरूं, जो देवे सोई खाऊं।जहां बैठावें तितही बैठूं, बेचै तो बिक जाऊं॥
मेरी उनकी प्रीत पुरानी, उन बिन पल न रहाऊं।मीरा के प्रभु गिरधर नागर, बार बार बलि जाऊं॥
